बांधवगढ़ और कान्हा टाइगर रिजर्व में इन दिनों दो बड़े शाकाहारी वन्यजीवों की वापसी की कहानी लिखी जा रही है। बांधवगढ़ में गौर (इंडियन बायसन) का कुनबा बढ़ रहा है, जबकि कान्हा में वन भैंसे (वाइल्ड बफेलो) को फिर बसाया जा रहा है। दोनों देखने में कुछ मिलते-जुलते लग सकते हैं, लेकिन अलग प्रजातियां हैं और इनके आवास और खान-पान में भी अंतर है।
गौर: विलुप्ति से 240 तक
बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व के क्षेत्र संचालक अनुपम सहाय के अनुसार गौर एशिया का सबसे बड़ा जंगली गौवंश है। बांधवगढ़ में यह 1998 में विलुप्त हो गया था। 2011-12 में कान्हा से 50 गौर लाकर यहां फिर बसाए गए और इनकी संख्या लगभग 170 तक पहुंची।
आनुवंशिक विविधता बनाए रखने के लिए सतपुड़ा से भी गौर लाए गए। फरवरी 2025 में 23 गौर (18 मादा, 5 नर) और जनवरी 2026 में 27 गौर (22 मादा, 5 नर) बांधवगढ़ पहुंचे। इस तरह 50 नए गौर लाने का लक्ष्य पूरा हुआ। इनकी निगरानी के लिए वीएचएफ कॉलर, हॉर्न स्लीव और ईयर टैग लगाए गए हैं। अभी बांधवगढ़ लैंडस्केप में गौर की संख्या लगभग 220 से 240 के बीच बताई गई है।
कान्हा में वन भैंसे
कान्हा टाइगर रिजर्व के उप संचालक पी.के. वर्मा के अनुसार यहां तीन वर्ष में 50 वन भैंसे लाने की योजना है। पहले चरण में 28 अप्रैल 2026 को वन भैंसे कान्हा पहुंचे। वन अधिकारियों का मानना है कि बड़े शाकाहारियों की वापसी से घास के मैदानों और पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूती मिलेगी।


